Story of ugna mahadev | भक्ति ऐसी की भोले भी दास बन गये

Friday, 30 November 2018

Story of ugna mahadev | भक्ति ऐसी की भोले भी दास बन गये

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Story of ugna mahadev  | भक्ति ऐसी की भोले भी दास बन गये 

कहते है ना अगर भक्ति में सकती हो तो हरकुछ संभव हैं Ugna mahadev और vidyapati की कहानी ये बखूबी बयां करती हैं आज हम बिहार के मधुबनी जिले में उपस्थित ugna mahadev mandir bhawanipur के बारे में बतायेंगे ये mandir उगना महादेव व उग्रनाथ मंदिर के नाम से काफी प्रसिद्ध है। 


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महाकवि विद्यापति मैथिली के सर्वोपरि कवि के रूप में जाने जाते हैं। वे भगवान शिव के बहुत बड़े भक्त थे उन्होंने भगवान शिव पर अनेको मैथिल गीतों की रचना की है। वो इतने बड़े भक्त थे उसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं की भगवान शिव उनके यहाँ उनके दास बनकर रहे, बात 1360 इसवी की हैं जब भगवान भोलेनाथ स्वंय इस मृत्युलोक पर ugna बनकर उनकी रचना सुनने के लिए उनके पास दास बनकर रहे !


क्या हैं Vidyapati ugna mahadev की कहानी ?

महाकवि विद्यापति भगवान शिव के बहुत ही बड़े भक्त थे उन्होंने अनेकोनेक मैथिल कविताएँ, रचनाए, और गीत लिखे हैं मान्यताओं के अनुसार, जगतव्यापी भगवान शिव विद्यापति की भक्ति व रचनाओं से बेहद प्रसन्न होकर स्वयं एक दिन वेश बदलकर उनके पास आए और कहने लगे की उनका नाम ugna हैं और उनकी पत्नी परवतिया (पार्वती) उन्हें घर से निकल दिया हैं और उनके पास अब रहने के लिए ना घर हैं ना खाने के लिए भांग और ना भोजन वो उन्हें अपने यहाँ नौकरी पर रख ले वो उनके सारे काम को कर दिया करेंगे लेकिन विद्यापति खुद आर्थिक रूप से सबल नही थे जो उनको नौकरी पर रख लेते लेकिन भोलेनाथ कहाँ मानने वाले थे वो विद्यापति को बार बार कहते रहे की वो बस दो बक्त की रोटी पर उनका सारा काम कर देंगे विद्यापति उनके बार - बार कहने को टाल नही सके और उन्होंने उन्हें नौकरी पर रख लिया !



भगवान शिव विद्यापति के सारे काम किया करते थे उनके भैस,गाई को चराना उन सभी जानवरों को नहाना खेत खलियान साफ़ करना और विद्यापति को खेती में हाथ बटाना और सब चीजो के समापन के बाद भांग पीकर विद्यापति के साथ बैठकर उनके लिखे रचना और गीतों को सुनते थे ! 

शिव ने विद्यापति को कब और कैसे दिया दर्शन ?


एक दिन विद्यापति ugna के साथ राजदरबार जा रहे थे, तेज़ गर्मी व धूप और जंगल के रास्ते बहुत दूर जाने के बाद विद्यापति का गला सूखने लगा, मगर आस-पास जल नहीं था। इस पर साथ चल रहे विद्यापति ने उगना (शिवजी) से जल लाने के लिए कहा। तब ugna अर्थात शिव ने इधर उधर बहुत प्रयास किया लेकिन कहीं दूर दूर तक जल नही था थोड़ा दूर जाकर उन्होंने अपनी जटा खोली व एक लौटा गंगाजल लेकर विद्यापति के पास पहुचे जल पीते ही विद्यापति को गंगाजल का स्वाद आया, उन्होंने सोचा कि इस वन के बीच यह जल कहां से आया उन्होंने ugna अर्थात शिव से पूछा रे ugna ये जल तुमने कहाँ से लाया शिव को उनकी की हुई चतुराई पकडे जाने की आशंका हुई उन्होंने कहाँ की पास की ही एक नदी से विद्यापति कहाँ ये मानने वाले थे की ये जल किसी नदी का है उन्हें तो पूरा विश्वास था की ये तो गंगाजल हैं उन्होंने ugna से कहाँ की वो उनको वो नदी दिखाए !


ugna विद्यापति को लेकर उस दिशा की तरफ बढे फिर दूसरी दिशा के तरफ बहुत ढूंढने के बाद भी कही कोई नदी नही मिला अब विद्यापति को संदेह हुआ कि कहीं उगना स्वयं भगवान शिव ही तो नहीं हैं। उन्होंने शिव के चरण पकड़ लिए तो शिव को अपने वास्तविक स्वरूप में आना पड़ा। इसके बाद शिवजी ने महाकवि विद्यापति के साथ रहने की इच्छा जताई और उन्हें बताया कि वह उगना बनकर ही साथ रहेंगे। उनके वास्तविक रूप का किसी को पता नहीं चलना चाहिए !


घर पहुचने के बाद विद्यापति के स्वाभाव में परिवर्तन आ गया था वो अब ugna को किसी भी काम को करने के लिए नही कहते थे उनके सभी काम को भी विद्यापति स्वयं करने लगेugna भी भांग खा कर कही पड़ा रहता था उन्हें जैसे कोई चिंता ही ना हो  ये सब विद्यापति की पत्नी को थोडा अजीब सा लगने लगा था !

शिव हुए अंर्तध्यान !


एक दिन विद्यापति की पत्नी ने ugna से कहाँ की मवेशियों को चारा देने के बाद कुछ लकड़ियाँ जंगल से लेते आये लेकिन ugna को ये सब याद कहाँ रहा वो तो भांग के नशे में कही पड़ा रहा बहुत देर के बाद जब वह घर पंहुचा विद्यापति की पत्नी अत्यंत घुस्से में थी वो जलती लकड़ी से उगना को पीटने के लिए जैसे ही बढ़ी की विद्यापति के मुख से निकल पड़ा यह तो साक्षात भगवान शिव हैं, और तुम इन्हें मारने जा रही हो ! इतना कहते ही शिव अंर्तध्यान हो गए। बाद अपनी भूल पर पछताते हुए कवि विद्यापति वनों में शिवजी को खोजने लगे।खाना-पीना सभी छोड़कर उगनाउगनाउगना रट लगाने लगे। उस समय भी महाकवि ने एक  गीत लिखा- उगना रे मोर कतय गेलाह। कतए गेलाह शिब किदहुँ भेलाह।।  मिथिला क्षेत्र के लोग विद्यापति की ये पंक्तियां उगना महादेव की कथा के साथ गाकर सुनाते हैं। 

कैसे ugna mahadev की स्थापना हुई ?


अपने प्रिय भक्त की ऐसी दशा देखकर भगवान उनके समक्ष प्रकट हुए और उन्हें समझाया कि मैं अब तुम्हारे साथ नहीं रह सकता। परंतु उगना के रूप में जो तुम्हारे साथ रहा उसके प्रतीक चिन्ह के रूप में अब मैं शिवलिंग के रूप में तुम्हारे पास विराजमान रहूंगा। उसके बाद से ही उस स्थान पर स्वयं भू शिवलिंग प्रकट हो गया।


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ugna mahadev मंदिर !

उगना महादेव मंदिर के गर्भगृह में जाने के लिए आपको छह सीढि़यां उतरकर जाना पड़ता हैं। इसी प्रकार उज्जैन में स्थित महाकाल मंदिर में भी शिवलिंग तक पहुंचने के लिए छह सीढ़ियां उतरनी पड़ती हैं। उगना महादेव मंदिर का शिवलिंग तल से पांच फुट नीचे है। यहां माघ कृष्ण पक्ष में मनाया जाता नर्क निवारण चतुर्दशी पर्व काफी धूमधाम से मनता है। वर्तमान उगना महादेव मंदिर 1932 का बनाया हुआ बताया जाता है। कहा जाता है कि 1934 के भूकंप में इस मंदिर का बाल बांका नहीं हुआ। अब मंदिर का परिसर काफी भव्य बन गया हैं, मुख्य मंदिर के अलावा परिसर में यज्ञशाला और संस्कारशाला बनाई गई है। मंदिर के सामने के सुंदर सरोवर है। इसके पास ही एक कुआं है। इस कुएं के बारे में कहा जाता है कि शिव ने यहीं से पानी निकाला था। काफी श्रद्धालु इस कुएं का पानी पीने के लिए यहां आते हैं।


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भवानीपुर गांव !


भवानीपुर गांव की आबादी छह हजार है। यहां कई जातियों के लोग रहते हैं। गांव में समरसता का माहौल है। गांव मधुबनी विधानसभा क्षेत्र में आता है। गांव में 1954 का बना हाई स्कूल है। गांव में सड़कें अच्छी हैं। मंदिर पास एक छोटा सा बाजार है। जहां खाने पीने के लिए मिल जाता है।

ugna mahadev कैसे पहुंच सकते हैं ?

दरभंगा से सकरी होकर मधुबनी जाने वाली रेलवे लाइन पर उगना हाल्ट पड़ता है। यहां से उगना महादेव मंदिर की दूरी करीब दो किलोमीटर है। बस से दरभंगा से सकरी होते हुए पंडौल पहुंचे। पंडौल से एक किलोमीटर पहले ब्रहमोतरा गांव से भवानीपुर की दूरी 4 किलोमीटर है। आप अगर यहाँ आना चाहते है तो आप हमे  contact us में जाकर contact कर सकते हैं !



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आपसे अनुरोध !

आपको vidyapati ugna mahadev के बारे ये कहानी कैसी लगी नीचे comment में जरुर बताये और ज्यादा से ज्यादा share कर के आप धर्म के भागिदार बने जिस से और भी लोग इस आलोकिक ugna mahadev की कहानी को पढ़ सके !

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