Manikeshwari -Hindu Spiritual Knowledge and history of hindu famous temples

Tuesday, 1 January 2019

जाने बैधनाथ धाम देवघर की पूरी कहानी

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12 ज्योतिर्लिंगों में से प्रसिद्ध बैद्यनाथ धाम जो कि देवघर के रूप में विख्यात है इस जगह को लोग बाबा बैजनाथ के रूप में भी जानते हैं कहते हैं कि भोलेनाथ यहां आने वाले सभी भक्तों की मनोकामनाएं को पूरी करते हैं इसलिए इस शिवलिंग को कामना लिंग भी कहते हैं !


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पुराणों के अनुसार सावन में भगवान शिव के लिए सबसे उपयुक्त समय बताया गया है ! सावन महीने में लाखों श्रद्धालु गण 105 किलोमीटर दूर सुल्तानगंज से जल भरकर कावर के जरिए बाबा बैजनाथ का जलाभिषेक करते हैं और उनकी कृपा प्राप्त करते हैं बैजनाथ धाम के पीछे की कहानी इतनी पुरानी और दिलचस्प है जिसे सुनकर आप भी पावन धाम के दर्शन करना जरूर चाहेंगे आज हम आपको इस blog के जरिए बाबा बैजनाथ धाम देवघर से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण बातों को बताएंगे और शिवलिंग की पौराणिक कहानी को भी बताएंगे !

देवघर से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्य 


बाबा बैजनाथ का धाम भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है इस ज्योतिर्लिंग को मनोकामना लिंग भी कहा जाता है मान्यता है कि राक्षस राज रावण ने कैलाश पर्वत पर तपस्या के बाद इसे वरदान स्वरूप में प्राप्त किया था

बैजनाथ ज्योतिर्लिंग एक मात्र ज्योतिर्लिंग हैं जहाँ शिव और शक्ति एक साथ विराजमान है पुराणों के अनुसार सुदर्शन चक्र के प्रहार से यही पर मां सती का हृदय कटकर गिरा था !

"बैधनाथ धाम" 51 शक्ति पीठो में से एक हैं कहते हैं शिव और शक्ति के इस मिलन स्थल पर ज्योतिर्लिंग की स्थापना खुद देवताओं ने की थी !

बैजनाथ धाम के बारे में कहा जाता है कि यहां मांगी मनोकामना पूर्ण जरूर होती है महाबली हनुमान जी और राम जी ने भी सावन माह के दौरान यहां कावड़ यात्रा भी की थी !

यह ज्योतिर्लिंग नीचे की ओर् दबा हुआ है शिव पुराण के पाताल खंड में "बैद्यनाथ धाम" ज्योतिर्लिंग की महिमा गाई गई है मन्दिर के समीप विशाल तालाब स्थित है

बाबा "बैजनाथ" का मुख्य मंदिर सबसे पुराना है जिसके आस पास अन्य मंदिर भी बने हैं बाबा भोलेनाथ का मंदिर मां पार्वती जी के मंदिर से जुड़ा हुआ है !


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प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि के 2 दिन पूर्व बाबा मंदिर मां पार्वती लक्ष्मी नारायण के मंदिर से पंचशूल उतारे जाते हैं इस दौरान पंचशूल को स्पर्श करने के लिए भक्तों की भीड़ उमड पड़ती है !

यह तो थी कुछ रोचक बातें बाबा बैजनाथ धाम के बारे में अब बात करते हैं यहां स्थित शिवलिंग की स्थापना की जो की बहुत ही रोचक हैं !


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शिवलिंग की स्थापना


पौराणिक कथाओं के अनुसार दशानन रावण भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए हिमालय पर घोर तपस्या कर रहा था एक एक करके अपना सिर काटकर शिवलिंग पर चढ़ा रहा था 9 शिर अर्पण करने के बाद जब रावण अपना अंतिम सिर काटने वाला था तब भोलेनाथ ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिए !

रावण के पास सोने की लंका के अलावा तीनो लोक में शासन करने की शक्ति तो थी ही उसने कई देवता, यक्ष, गन्धर्व को भी कैद करके लंका में रखा हुआ था इसी वजह से रावण ने यह इच्छा जताई कि भगवान शिव भी कैलाश छोड़कर लंका में रहे! इसी मनसा से उसने कामना लिंग को लंका ले जाने का वरदान मांग लिया शिव जी ने अनुमति दे दी पर इस चेतावनी के साथ दी कि यदि वह इस कामना लिंग को पृथ्वी के मार्ग में कहीं भी रखेगा रखेगा तो वो वही स्थापित हो जाएगा महादेव की चेतावनी को सुनने के बावजूद भी रावण शिव जी को ले जाने के लिए तैयार हो गया !

रावण के पेशाव से हुआ कुंड का निर्माण 


इधर महादेव को कैलाश छोड़ने की बात सुनते ही सभी देवता चिंतित हो गए और सभी भगवान विष्णु के पास गये ! भगवान विष्णु सत श्री हरि ने लीला रची और भगवान वरुण को आचमन के जरिये रावण के पेट में घुसने को कहा !

इधर रावण शिवलिंग को लेकर लंका की ओर चला तो उसे "देवघर" के पास लघुशंका लग गई उसने आसपास देखा कि कोई मिल जाए तो वो उसे शिवलिंग थमा कर लघुशंका से निवृत हो आये ! कुछ देर के बाद उसे एक ग्वाला नजर आया जिसका नाम बैजू था कहते हैं उस रूप में भगवान विष्णु वहां आए थे !

रावण ने ग्वाले से कहा कि वह शिवलिंग को पकड़कर रखें ताकि वह लघुशंका से निवृत हो सके और साथ ही साथ उसने यह भी कहा कि इस शिवलिंग को भूल से भी भूमि पर नहीं रखना !

रावण लघुशंका करने लगा और उस लघुशंका से एक तालाब बन गया लेकिन रावण की लघुशंका नहीं समाप्त हुई! ग्वाले के रूप में मौजूद भगवान विष्णु ने रावण से कहा कि अब बहुत देर हो चुकी है अब मैं और शिव लिंग को लिए खड़ा नहीं रह सकता इतना कहकर उसने शिवलिंग को जमीन पर रख दिया जब रावण लघुशंका से लौट कर आया तो लाख कोशिशों के बावजूद भी शिवलिंग उठा नहीं पाया !


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रावण ने क्रोधित होकर शिवलिंग पर अपना अंगूठा गरा कर चला गया उसके बाद ब्रह्मा विष्णु देवताओं ने आकर वहां शिवलिंग की पूजा की !
शिव जी का उसी स्थान पर स्थापना कर दी जो "देवघर" में आता हैं !

सुल्तानगंज से देवघर की यात्रा


बैधनाथ धाम की पवित्र यात्रा श्रावण मास में शुरू होती है सबसे पहले भक्त सुल्तानगंज पहुंचते हैं वहां से सभी पवित्र गंगाजल ले कर बैधनाथ धाम "देवघर" की ओर जो की सुल्तानगंज से 108 KM दूर है , पवित्र जल लेकर जाते समय सभी इस बात का ध्यान रखते हैं कि जिस पात्र में गंगाजल है वह जमीन में ना छुए और पूरी पवित्रता और निष्ठा का भी ख्याल रखा जाता है !

बास्कीनाथ मंदिर
बास्कीनाथ मंदिर भी शिव के लिए जाना जाता है बैधनाथ मंदिर की यात्रा तब तक अधूरी मानी जाती है जब तक आप बास्की नाथ के दर्शन नहीं कर आते यह मंदिर "देवघर" से 42 किलोमीटर दूर जरमुंडी गांव के पास स्थित है मंदिर के प्रांगण में छोटे-बड़े बहुत सारे मंदिर है !
बैजू मंदिर
बैजू मंदिर बाबा "बैधनाथ" मंदिर के पश्चिम में हैं इसके समीप 3 और भी मंदिर है यह सभी मन्दिर बैजू मंदिर के नाम से जाना जाता है इन मंदिरों का निर्माण बाबा "बैधनाथ" मंदिर के मुख्य पुजारी के वंशजों ने किया है प्रत्येक मंदिर में भगवान शिव स्थापित है बैजू वही ग्वाला था जो की रावण के लघुशंका के समय वहां मौजूद था !
बाबा धाम पर बनी फिल्म !

बाबा धाम पर हिंदी फिल्म भी बनी है जो कि 1980 में गंगा धाम के नाम से रिलीज हुई थी इसमें अरुण गोविल और नमिता चंद्रा अभिनेत्री थी अतिथि भूमिका में सुनील दत्त थे ! यह फिल्म यात्रा बोल बम पर केंद्रित है !

कहते हैं कि "बैजनाथ धाम" देवघर में मन से मांगी गई मनोकामना देर से ही पर जरूर पूर्ण होती है अगर आपने भी कभी बैधनाथ धाम के ज्योतिर्लिंग की दर्शन किए हैं तो अपने अनुभव हमें कमेंट में लिखिए पसंद आए तो लाइक जरूर कीजिएगा और share करना मत भूलियेगा !



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Thursday, 13 December 2018

History of Chardham yatra in hindi

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HISTORY OF CHARDHAM YATRA IN HINDI

चारधाम (CharDham yatra)का इतिहास, महाभारत काल में पांडवों के द्वारा “बद्रीनाथ”, “केदारनाथ”, “गंगोत्री” और “यमुनोत्री” के रूप में परिभाषित किया गया है। पांडवों का मानना था कि ये chardham yatra ऐसी है, जहाँ लोग जाकर अपने पापों को शुद्ध कर सकते हैं। 


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CHARDHAM


आधुनिक दिनों में, चारधाम भारत में चार तीर्थ स्थलों के नाम हैं जो हिंदुओं द्वारा व्यापक रूप से सम्मानित हैं। इसमें बद्रीनाथ, द्वारका, पुरी और रामेश्वरम शामिल हैं। हिंदुओं द्वारा अपने जीवनकाल के दौरान चारधाम (chardham yatra) की यात्रा करना बहुत बड़ा पुण्य  माना जाता है।। आदि शंकराचार्य द्वारा परिभाषित चारधाम में चार वैष्णव तीर्थयात्रा शामिल हैं।

भारत के उत्तराखंड राज्य में प्राचीन तीर्थयात्रायों अर्थात यमुनोत्री , गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ को छोटा धाम के रूप में जाना जाता है।


भक्ति ऐसी की भोले भी दास बन गये इस अनोखी कहानी को जरुर पढ़े !


CharDham Story in Hindi 

आइये Chardham yatra के बारे में इस पोस्ट में हम इन चीजो के बारे में जानेगे फिर हम सभी धामों के बारे में अलग अलग से पूरी विस्तार पूर्वक जानेगे !
CHARDHAM yatra क्या हैं?  
CHARDHAM कहाँ हैं? 
CHARDHAM के कहानी के बारे में जाने ? 


बद्रीनाथ

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, बद्रीनाथ तब प्रसिद्ध हुआ जब विष्णु के अवतार नर-नारायण ने वहां तपस्या की। उस समय वह जगह बेरी के पेड़ से भरी थी।


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संस्कृत भाषा में उन्हें बद्री कहा जाता है, विशेष स्थान जहां नर-नारायण ने तपस्या की, एक बड़ा बेरी का पेड़ उसे बारिश और सूरज से बचाने के लिए ढक गया। 

स्थानीय लोगों का मानना है कि माता लक्ष्मी नारायण को बचाने के लिए बेरी का पेड़ बन गयी। तपस्या के बाद, नारायण ने कहा, लोग हमेशा उनके नाम से पहले उसका नाम लेंगे, इसलिए हिंदू हमेशा "लक्ष्मी-नारायण" का उल्लेख करते हैं। 

इसलिए इसे बद्री-नाथ यानी बेरी वन के भगवान कहा जाता था। यह सब सत-युग में हुआ था। तो बद्रीनाथ को पहले धाम के रूप में जाना जाने लगा।

रामेश्वरम

दूसरी जगह, रामेश्वरम जब त्रेतायुग में भगवान राम रावन से युद्ध करने लंका जा रहे थे तो युद्ध से पूर्व  भगवान राम ने यहां एक शिव-लिंग बनाया और भगवान शिव के आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए इसकी पूजा की।

रामेश्वरम नाम का अर्थ है "भगवान राम का भगवान"। राम भगवान विष्णु के अवतार है।


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 द्वारका

तीसरे धाम द्वारका को द्वापर युग में इसका महत्व मिला जब भगवान विष्णु के एक अन्य अवतार भगवान कृष्ण ने उनके जन्मस्थान मथुरा के बजाय द्वारका को अपना निवास बनाया।


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शंकराचार्य पीठ

चारों  धाम में चौथा शंकराचार्य पीठ है, जिसमें हिन्दू धर्म के बारे में शिक्षा दी जाती है | शंकराचार्य पीठ ने कम से कम चार हिंदू मठवासी संस्थान बनाए है, उन्होंने इन चार मठों (संस्कृत: मठ) (संस्थानों / आश्रमों ) के तहत हिंदू अभ्यासकों का आयोजन किया,  इन चार मठों के मुख्यालय – पश्चिम में द्वारिका, पूर्व में जगन्नाथ पुरी, दक्षिण में श्रृंगेरी शारदा पीठम और उत्तर में बदरिकाश्रम) के तहत हिंदू अभ्यासकों का आयोजन किया।


हिन्दू पुराणों में हरि (विष्णु) और हर (शिव) को शाश्वत मित्र कहा जाता है। यह कहा जाता है कि जहां भी भगवान विष्णु रहते है, भगवान शिव भी वही आसपास रहते हैं। चार धाम भी इसके अपवाद नहीं हैं। इसलिए  केदारनाथ को बद्रीनाथ की जोड़ी के रूप में माना जाता है| रंगनाथ स्वामी को रामेश्वरम की जोड़ी माना जाता है| सोमनाथ को द्वारिका की जोड़ी के रूप में माना जाता है, हालांकि यहां एक बात ध्यान देने योग्य यह भी है कि कुछ परंपराओं के अनुसार चार धाम बद्रीनाथ, रंगनाथ-स्वामी, द्वारिका और जगन्नाथ-पुरी हैं, जिनमें से चार वैष्णव स्थल हैं, और उनसे संबंधित स्थान क्रमशः केदारनाथ, रामेश्वरम, सोमनाथ और लिंगराज मंदिर, भुवनेश्वर (या गुप्तेश्वर हो सकते हैं) हैं।

Chardham (चारधाम ) कहाँ हैं ?

जगन्नाथ मंदिर, पुरी

पूर्वी भारत के पूर्व ओडिशा राज्य में जगन्नाथ मंदिर, पुरी स्थित है। जो बंगाल की खाड़ी के तट पर है। जगन्नाथ पुरी के मुख्य भगवान श्री कृष्ण हैं जो की जगन्नाथ  के रूप में पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं ! यह एकमात्र मंदिर है, जहां भगवान कृष्ण अपने बहन सुभद्रा और भाई भगवान बलभद्र और भगवान जगन्नाथ के साथ पूजे जाते है। यहां का मुख्य मंदिर लगभग 1000 वर्ष पुराना है और इसका निर्माण राजा चोड़ा गंगा देव और राजा त्रितिया भीम देव ने किया था।

पुरी गोवर्धन मठ, चार मुख्य संस्थानों में से एक आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित मठों में से है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर, उनमें से तीनों हर जगह एक साथ हैं कल युग में पुरी में जगन्नाथ मंदिर के रूप श्रीमंदिर में जगन्नाथ -विष्णु, बालभद्र-महेश्वर और सुभद्रा-ब्रह्मा का एक साथ होना यह उड़िया के लोगों के लिए यह सम्मान की बात है, पुरी में यह एक विशेष दिन होता है उस दिन सभी लोग मिलकर जश्न मनाते है, जिसे हम रथ यात्रा (“रथ महोत्सव”) के नाम से जानते है।

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रामेश्वरम मंदिर Rameshwaram Temple
रामेश्वरम भारत के दक्षिण में स्थित तमिलनाडु राज्य में है। यह भारतीय प्रायद्वीप के मानार की खाड़ी में स्थित है। ग्रंथो के अनुसार, यह वह जगह है जहां भगवान राम ने लंका पर आक्रमण से पूर्व भगवान शिव की समुद्र के रेत से शिवलिंग बना कर उनकी पूजा किये था और एक पुल बनाया था जो की  राम सेतु के नाम से जाना जाता हैं । जिसका आभास आज भी वहां मिलती हैं !

रामेश्वरम हिंदुओं के लिए महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि यह बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर, उनमें से तीनों हर जगह एक साथ हैं !

द्वारका Dwarka

Dwarka भारत के पश्चिम गुजरात शहर में स्थित हैं जिसका नाम संस्कृत भाषा में "द्वार" यानी 'द्वार' शब्द से लिया गया है। जहां गोमती नदी अरब सागर में विलीन हो जाती है। हालांकि, यह नदी गोमती एक ही गोमती नदी नहीं है जो गंगा नदी की सहायक है। द्वारका का पौराणिक शहर भगवान कृष्ण का निवास स्थान था। यह प्रसिद्ध शहर द्वारिका भारत के पश्चिमी भाग में स्थित है । 

यह माना जाता है कि समुद्र के नुकसान और विनाश के कारण, द्वारिका ने छह बार जलमग्न किया, और आधुनिक दिनों में इस जगह पर बना द्वारिका 7 वां शहर है। 

बद्रीनाथ मंदिर Badrinath Temple

बद्रीनाथ
उत्तराखंड राज्य में स्थित है। यह अलकनंदा नदी के किनारे गढ़वाल पहाड़ियों में है। यह शहर नर और नारायण पर्वत श्रृंखलाओं और नीलकंथा शिखर की छाया में (6,560 मीटर) के बीच स्थित है।


निवेदन 

आपको ये पोस्ट कैसा लगा नीचे जरुर बताये हमे आपके सलाह और उत्साहवर्धक कमेन्ट्स का इंतज़ार रहेगा और इस पोस्ट को share जरुर कीजिये जिससे हर हिन्दू भाई तक ये जानकारी पहुचे !

आपका एक share हिन्दुधर्म को चार कदम आगे ले जाएगा !

राजा के चिता पर बने श्यामा काली की अनोखी कहानी को जरुर पढ़े !

Sunday, 2 December 2018

राजा के चिता पर बना हैं श्यामा काली मंदिर जाने पूरी कहानी !

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राजा के चिता पर बना हैं श्यामा काली मंदिर आइये जानते हैं क्या हैं इसके पीछे की कहानी !
बिहार के दरभंगा जिले में राजा के चिता पर बना हैं श्यामा काली मंदिर इस मंदिर को मनोकामना मंदिर  के नाम से भी जाना जाता है। मां काली के धाम  में बड़ी संख्या में श्रद्धालु मांगलिक कार्य करने आते हैं ! 


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हिन्दू धर्म में ऐसी मान्यता हैं की किसी शुभ कार्य होने के एक साल तक किसी भी दाह संस्कार या किसी भी श्मशान भूमि में नही जाना चाहिए और ना ही श्राध्द का दाना खाना चाहिए !

श्यामा मंदिर , जो श्मशान भूमि पर हैं जहाँ लोग शुभ कार्य मुंडन,उपनयन, विवाह  जैसी सभी मांगलिक कार्य करने आते हैं यहाँ हजारो की संख्या में लोग प्रतिदिन आते हैं ! श्यामा मंदिर में सालो के सभी दिन कीर्तन-भजन और धार्मिक कार्यक्रम होते रहता हैं !

Friday, 30 November 2018

Story of ugna mahadev | भक्ति ऐसी की भोले भी दास बन गये

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Story of ugna mahadev  | भक्ति ऐसी की भोले भी दास बन गये 

कहते है ना अगर भक्ति में सकती हो तो हरकुछ संभव हैं Ugna mahadev और vidyapati की कहानी ये बखूबी बयां करती हैं आज हम बिहार के मधुबनी जिले में उपस्थित ugna mahadev mandir bhawanipur के बारे में बतायेंगे ये mandir उगना महादेव व उग्रनाथ मंदिर के नाम से काफी प्रसिद्ध है। 


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महाकवि विद्यापति मैथिली के सर्वोपरि कवि के रूप में जाने जाते हैं। वे भगवान शिव के बहुत बड़े भक्त थे उन्होंने भगवान शिव पर अनेको मैथिल गीतों की रचना की है। वो इतने बड़े भक्त थे उसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं की भगवान शिव उनके यहाँ उनके दास बनकर रहे, बात 1360 इसवी की हैं जब भगवान भोलेनाथ स्वंय इस मृत्युलोक पर ugna बनकर उनकी रचना सुनने के लिए उनके पास दास बनकर रहे !

Wednesday, 28 November 2018

Manikeshwari bhagwati

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Manikeshwari Bhagwati से जुड़ी कहानी !

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Manikeshwari bhagwati Damodarpur गावं के दक्षिण दिशा में स्थित हैं , सिद्धपीठ manikeshwari bhagwati  के बारे में ऐसा कहा जाता हैं की जो भी भक्त पूरी श्रधा से इनके शरण में आया हैं माँ manikeshwari mata ने उसकी सभी कार्यो को सफल की हैं !

Wednesday, 21 November 2018

Uchchaith Bhagwati

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उच्चैठवासनी भगवती से जुड़ी कहान ी!

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Uchchaith Bhagwati

Uchchaith bhagwati के बारे में जाने !

प्राचीन मध्य से मिथिलांचलक धरोहर Uchchaith bhagwati जो कि बिहार के मधुबनी जिला में बेनीपट्टी से चार किलोमीटर पश्चिम दिशा में एक पर्यटक स्थलों में से है ये मंदिर प्राचीन काल से ही सिद्धपीठ Uchchaithvasni bhagwati के नाम से प्रचलित हैं इस मंदिर मे छिन्नमस्तिका दुर्गा माँ विराजित है इस मंदिर में जो भी श्रद्धालु पूरी निष्ठा से विश्वास  से जो भी मनोकामनाएं माँगता है वो उसे मिल जाता है इस मंदिर से एक बहुत ही प्राचीन कहानी जुड़ी हुई है इस मंदिर के पूर्व दिशा में एक संस्कृत विद्यालय है जिसके और मंदिर के बीच एक नदी बहती है ।